Article by: Rajesh Patil
कृष्ण और अर्जुन संवाद मे एक शब्द आता है "तो",यहाँ कृष्ण भी अनुत्तर हो जाते है,कहते है यह शब्द "तो' अनंत संभावनाओ से भरा है.
यहाँ कुछ भी घटित हो सकता है और नहीं भी.
किसी भी अर्थ या विचार को तर्क की कसौटी पर कसना हमे कहाँ पहुचाता है,प्रश्न के जो हमे उत्तर मिलते है वे हमेशा प्रश्न बन कर खड़े हो जाते है,प्रश्न अनुत्तर ही रह जाता है,तब हमे जो है जैसा है उसी स्वरूप मे स्वीकार करना होता है,उसके अच्छे-बुरे के साथ. यह सर्वविदित है की जो जन्मा है उसकी मृत्यु भी निश्चित है,यह जन्म-मृत्यु ,काला-सफ़ेद ,सच-झूठ,क्रिया-प्रतिक्रिया, ये सभी परिधियाँ जहाँ हर चीज या विचार अपनी विरोधी सीमाओं तक जाता है और वही से फिर गति करता है,यह एक अंतहीन चक्र है.
यहाँ यह कहना की कला स्वत: क्रिया है तो उसको करने वाला "कलाकार" कारक जो स्वयं किसी क्रिया या प्रतिक्रिया की वजह से जन्मा है ,उसका कर्म क्या कहलायगा ? समय और प्रकृति मे मनुष्य स्वयं एक रचना है कृति है.तब यहाँ निर्धारित करना कठिन है की कला स्वत क्रिया है.
भूख की आकांक्षा हर कृति के जन्म मे होती है,भूख का यह मिथक काल उसके समकालीन मे आँखें गडाये रहता है,कृति की असम्पूर्णता ही उसे गतिशील बनाये रखती है,सम्पूर्णता का यही आग्रह हमे एक कृति से दूसरी कृति के गढ़ने ,करने,बनाने होने ,आदि के लिए बाध्य करता है..मुझे नहीं पता की कितने कलाकार किसी भी कृति को करते वक्त सचेत होते है,की वह क्रिया है या प्रतिक्रिया है.चूँकि हर कलाकार का बोध स्मृति ,मिथक,परम्परा,प्रकृति,संस्कृति
,सभ्यता,इतिहास,राजनीति,आदि से मिलकर
बनता है,इन वृतियों और बोध मे रहते हुए वह जाने अनजाने किस प्रेरणा से वह
कृति का निर्माण करता है, यहाँ कृति के निर्माण मे "प्रेरक तत्व " मौजूद
है.
यह एक चिर -फाड़ का विषय है.क्रिया-विषय -कारण-जन्म -मरण.
कोई भी क्रिया बिना कारण की नहीं होती,कारण बिना विषय के नहीं होता ,विषय का जन्म होता है मरता है......
"विषय का चयन" एक क्रिया मेरा उस पर लिखना प्रतिक्रिया.......... क्या है?
विषय का चयन क्या है?
यह संदेह ही हमें समग्र नहीं होने देता ,वह हर चीज या कृति की सम्पूर्णता को,पवित्रता को नष्ट कर देता है,हम उसे सम्पूर्णता,समग्रता मे नहीं देख पाते,हम उसे अपने अपने तर्कों पर परखते है तौलते है,हम सबके पूर्वाग्रह है,हम अपने पूर्वाग्रहों के साथ सुनते ,गुनते,मनते,देखते,है.
तभी हमे राम पर संदेह होता है,सीता को अग्नि परीक्षा देनी पड़ती है.
हम सब अँधेरे और प्रकाश के साथ है,हर कृति क्रिया-प्रतिक्रिया के साथ है,वह सच-झूठ साथ है,उसका अपना अँधेरा और उजाला साथ है , जैसे ही अँधेरा घना होता है,प्रकाश का अभाव होता है,तब हम प्रकाश को खोजते है,हर अँधेरा अपने मे प्रकाश छिपाए रहता है, यह अभाव ही हमे जीवन मे झूझने के लिए प्रेरित करता है, "जीवट" बनाता है,
सफ़ेद कागज या कैनवास पर हम सफ़ेद खोजते है! हम उसे पहले रंगते है,गहराते है और गहरा करते है और फिर वापस लौटते है,सफ़ेद या काली रेखाओ मे,रंग ,आकार,रूप,मे हमे लौटना होता है.एक सत्य उसके विपरीत ध्रुव तक जाता है -वापस लौटता है,...........
काला सफ़ेद की ओर , सफ़ेद काले की ओर.
कृष्ण और अर्जुन संवाद मे एक शब्द आता है "तो",यहाँ कृष्ण भी अनुत्तर हो जाते है,कहते है यह शब्द "तो' अनंत संभावनाओ से भरा है.
यहाँ कुछ भी घटित हो सकता है और नहीं भी.
किसी भी अर्थ या विचार को तर्क की कसौटी पर कसना हमे कहाँ पहुचाता है,प्रश्न के जो हमे उत्तर मिलते है वे हमेशा प्रश्न बन कर खड़े हो जाते है,प्रश्न अनुत्तर ही रह जाता है,तब हमे जो है जैसा है उसी स्वरूप मे स्वीकार करना होता है,उसके अच्छे-बुरे के साथ. यह सर्वविदित है की जो जन्मा है उसकी मृत्यु भी निश्चित है,यह जन्म-मृत्यु ,काला-सफ़ेद ,सच-झूठ,क्रिया-प्रतिक्रिया, ये सभी परिधियाँ जहाँ हर चीज या विचार अपनी विरोधी सीमाओं तक जाता है और वही से फिर गति करता है,यह एक अंतहीन चक्र है.
यहाँ यह कहना की कला स्वत: क्रिया है तो उसको करने वाला "कलाकार" कारक जो स्वयं किसी क्रिया या प्रतिक्रिया की वजह से जन्मा है ,उसका कर्म क्या कहलायगा ? समय और प्रकृति मे मनुष्य स्वयं एक रचना है कृति है.तब यहाँ निर्धारित करना कठिन है की कला स्वत क्रिया है.
भूख की आकांक्षा हर कृति के जन्म मे होती है,भूख का यह मिथक काल उसके समकालीन मे आँखें गडाये रहता है,कृति की असम्पूर्णता ही उसे गतिशील बनाये रखती है,सम्पूर्णता का यही आग्रह हमे एक कृति से दूसरी कृति के गढ़ने ,करने,बनाने होने ,आदि के लिए बाध्य करता है..मुझे नहीं पता की कितने कलाकार किसी भी कृति को करते वक्त सचेत होते है,की वह क्रिया है या प्रतिक्रिया है.चूँकि हर कलाकार का बोध स्मृति ,मिथक,परम्परा,प्रकृति,संस्कृति
यह एक चिर -फाड़ का विषय है.क्रिया-विषय -कारण-जन्म -मरण.
कोई भी क्रिया बिना कारण की नहीं होती,कारण बिना विषय के नहीं होता ,विषय का जन्म होता है मरता है......
"विषय का चयन" एक क्रिया मेरा उस पर लिखना प्रतिक्रिया.......... क्या है?
विषय का चयन क्या है?
यह संदेह ही हमें समग्र नहीं होने देता ,वह हर चीज या कृति की सम्पूर्णता को,पवित्रता को नष्ट कर देता है,हम उसे सम्पूर्णता,समग्रता मे नहीं देख पाते,हम उसे अपने अपने तर्कों पर परखते है तौलते है,हम सबके पूर्वाग्रह है,हम अपने पूर्वाग्रहों के साथ सुनते ,गुनते,मनते,देखते,है.
तभी हमे राम पर संदेह होता है,सीता को अग्नि परीक्षा देनी पड़ती है.
हम सब अँधेरे और प्रकाश के साथ है,हर कृति क्रिया-प्रतिक्रिया के साथ है,वह सच-झूठ साथ है,उसका अपना अँधेरा और उजाला साथ है , जैसे ही अँधेरा घना होता है,प्रकाश का अभाव होता है,तब हम प्रकाश को खोजते है,हर अँधेरा अपने मे प्रकाश छिपाए रहता है, यह अभाव ही हमे जीवन मे झूझने के लिए प्रेरित करता है, "जीवट" बनाता है,
सफ़ेद कागज या कैनवास पर हम सफ़ेद खोजते है! हम उसे पहले रंगते है,गहराते है और गहरा करते है और फिर वापस लौटते है,सफ़ेद या काली रेखाओ मे,रंग ,आकार,रूप,मे हमे लौटना होता है.एक सत्य उसके विपरीत ध्रुव तक जाता है -वापस लौटता है,...........
काला सफ़ेद की ओर , सफ़ेद काले की ओर.
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