Article by: Pramod Gaikwad
क्रिया-प्रतिक्रिया मनुष्य की होती है, खुद कला की नहीं.
कला खुद एक प्रक्रिया है उसका अपना जीवन धडकता रहता है.
प्रतिक्रिया : पंचेंद्रियो द्वारा महसूस की
गई सवेंदना (सुखद,दुखद और असुखद, अदुखद) के प्रति मनुष्य
प्रतिक्रिया करता है.जैसे किसी ने हमे कुछ कहा और कान द्वारा सुनते
ही मन यह परखता है की यह शब्द तारीफ के है या निंदा के और मन प्रतिक्रिया
करने लगता है.
कला में प्रतिक्रिया :
* कलाकार के लिए प्रतिक्रिया व्यक्त करने का माध्यम है कला.
* प्रतिक्रिया कलात्मक होती है.
* प्रतिक्रिया सापेक्ष होती है
* प्रतिक्रिया सकारत्मक नकारात्मक होती है.विरोध है, सहमती असहमति ,अच्छी-खराब
*प्रतिक्रिया से अमानवीय कला का जन्म हो सकता है, हुआ है.
वह हमें प्रकृति से अपने होने से दूर भटकाती है. मनुष्य प्रतिक्रिया
का इतना आदि हो गया है की वह क्रिया और प्रतिक्रिया के भेद को समझ नहीं
सकता और कलाकार इस से अलग नहीं.
आर्ट फॉर्म प्रतिक्रिया से उपजते है.वर्तमान समय में कला में
प्रतिक्रिया हो रही है मगर प्रभावशाली कम सपाट ज्यादा संवेदना मोथरी
लगती है.राजनेता के बयान की तरह, समाजसेवी के प्रण की तरह, नकली संतो की
मुक्ति की घोषणा की तरह.
प्रतिक्रिया कलात्मक होनी चाहिये.. प्रतिक्रिया कलात्मक हो तो वह हमे जीवन को देखने का नया आयाम दे सकती है.
क्रिया : एक तरह का होना,शुद्ध रूप में होना, कर्म
करते रहना.बिजली कौंधती है, बारिश, हवा,प्रकृति आदि. क्रिया है.कला
में केवल सर्जक क्रियाशील होता है, अगर वह निरपेक्ष होकर कर्म करता रहे तो
वह क्रियाशील होता है. मेरा अपना अनुभव है की निरपेक्षता से कला कर्म करते
समय मै सिर्फ क्रियाशील होता हूँ, और सापेक्ष होते ही प्रतिक्रिया करने
लगता हूँ.
दुःख से मुक्ति के लिए बुद्ध ने क्रिया को रचनात्मक कहा है.बुद्ध
को ज्ञान प्राप्त हुआ. और मनुष्य इसे फार्मूले की तरह उपयोग करता
रहा है, और कलाकार भी.
आज के समय की भयानक सच्चाई यह है की हम क्रिया-प्रतिक्रिया को कला में
फार्मूले की तरह इस्तमाल करते रहे, कर रहे है. और कला कोई फार्मूला नहीं
है,वह खुद एक फॉर्म है.
कला क्रिया-प्रतिक्रिया से होकर जरुर गुजरती है, मगर यह रूकती नहीं
क्रिया-प्रतिक्रिया से उठकर मनुष्य की सारी अछाई-बुराई,+ -. से इतर एक ऐसा
आकाश देती है जहाँ सर्जक,दृष्टा-दर्शक, पंछी
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